विजया एकादशी व्रत कथा
प्राचीन काल की बात है। जब भगवान श्रीराम माता सीता को रावण से मुक्त कराने के लिए वानर सेना के साथ लंका की ओर बढ़ रहे थे, तब उनके सामने सबसे बड़ी बाधा समुद्र था। समुद्र इतना विशाल था कि उसे पार करना असंभव प्रतीत हो रहा था।
श्रीराम ने तीन दिनों तक समुद्र देव से प्रार्थना की, किंतु समुद्र देव प्रकट नहीं हुए। तब लक्ष्मण जी क्रोधित हो उठे और समुद्र को सुखा देने की बात कहने लगे। उसी समय वानर सेना में अत्यंत ज्ञानी और तपस्वी जाम्बवान जी आगे आए।
जाम्बवान जी ने भगवान श्रीराम से कहा —
“हे प्रभु! फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को विजया एकादशी कहा जाता है। यदि आप इस दिन भगवान विष्णु का विधिपूर्वक व्रत करें, तो असंभव कार्य भी संभव हो जाता है और विजय अवश्य प्राप्त होती है।”
🌿 विजया एकादशी का व्रत
जाम्बवान जी की सलाह पर भगवान श्रीराम, लक्ष्मण जी, वानर सेना तथा विभीषण ने विजया एकादशी का व्रत किया।
- ब्रह्ममुहूर्त में स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण किए
- भगवान विष्णु की प्रतिमा स्थापित की
- धूप, दीप, पुष्प, फल, तुलसी दल अर्पित किए
- “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप किया
- दिनभर उपवास रखकर रात्रि में जागरण किया
- द्वादशी के दिन विधिपूर्वक पारण किया
🌊 समुद्र देव का प्रकट होना
व्रत के प्रभाव से समुद्र देव स्वयं प्रकट हुए और श्रीराम से क्षमा याचना करते हुए बोले —
“हे प्रभु! अब आप नल-नील द्वारा बनाए गए सेतु के माध्यम से समुद्र पार कर सकते हैं। मैं आपका मार्ग अवरुद्ध नहीं करूँगा।”
इसके बाद राम सेतु का निर्माण हुआ और वानर सेना लंका पहुँची।
⚔️ विजय की प्राप्ति
लंका पहुँचकर भगवान श्रीराम ने रावण का वध किया और माता सीता को मुक्त कराया। इस प्रकार विजया एकादशी के प्रभाव से श्रीराम को विजय प्राप्त हुई, तभी से इस एकादशी का नाम “विजया” पड़ा।
✨ कथा का फल
जो श्रद्धालु भक्त विजया एकादशी का व्रत करता है —
- उसके सभी कष्ट दूर होते हैं
- शत्रुओं पर विजय मिलती है
- रुके हुए कार्य पूर्ण होते हैं
- पापों का नाश होता है
- अंत में वैकुंठ लोक की प्राप्ति होती है
बृहस्पति व्रत कितने समय तक करना चाहिए
