होलिका दहन की पौराणिक कथा
होलिका दहन की कथा भक्ति, आस्था और बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। यह कथा भक्त प्रह्लाद, दैत्यराज हिरण्यकश्यप और उसकी बहन होलिका से जुड़ी है।
📖 कथा का आरंभ
प्राचीन काल में हिरण्यकश्यप नामक एक अत्याचारी असुर राजा था। उसने कठोर तपस्या कर वरदान प्राप्त किया था कि वह किसी मनुष्य या पशु से, न दिन में न रात में, न घर के अंदर न बाहर, न अस्त्र से न शस्त्र से मारा जा सके। इस वरदान के कारण वह अत्यंत अहंकारी हो गया और स्वयं को भगवान मानने लगा।
उसने अपने राज्य में आदेश दिया कि कोई भी भगवान की पूजा न करे, केवल उसी की आराधना की जाए।
🙏 प्रह्लाद की भक्ति
हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का परम भक्त था। वह हर समय विष्णु भक्ति में लीन रहता था। जब पिता ने उसे समझाने की कोशिश की, तो भी वह अपनी भक्ति से डिगा नहीं।
क्रोधित होकर हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को कई प्रकार की यातनाएँ दीं:
- ऊँचे पर्वत से गिरवाया
- हाथियों से कुचलवाने की कोशिश की
- विष दिलवाया
लेकिन हर बार भगवान विष्णु की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित बच गए।
🔥 होलिका दहन की घटना
अंततः हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका की सहायता ली। होलिका को वरदान था कि वह अग्नि में नहीं जलेगी। योजना के अनुसार होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठ गई।
परंतु वरदान का दुरुपयोग करने के कारण होलिका जलकर भस्म हो गई और भगवान की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित बच गए।
इसी घटना की स्मृति में होलिका दहन किया जाता है, जो बुराई के अंत और सत्य की विजय का प्रतीक है।
🦁 कथा का अंत
बाद में भगवान विष्णु ने नरसिंह अवतार लेकर हिरण्यकश्यप का वध किया।
नरसिंह अवतार ने संध्या समय (न दिन न रात), द्वार की चौखट पर (न अंदर न बाहर), अपने नखों से (न अस्त्र न शस्त्र) हिरण्यकश्यप का अंत किया — इस प्रकार वरदान की शर्तें भी पूरी हुईं।
🌸 संदेश
- सच्ची भक्ति और आस्था की हमेशा जीत होती है।
- अहंकार और अधर्म का अंत निश्चित है।
- होलिका दहन हमें अपने अंदर की बुराइयों को जलाने का संदेश देता है।
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