शिवपूजन के समय मन को इधर-उधर न भटकाएँ
शिवपूजन केवल बाहरी कर्मकांड नहीं, बल्कि मन, भाव और चेतना की साधना है। भगवान शिव को अंतःकरण के देवता कहा जाता है, इसलिए उनकी पूजा में मन की एकाग्रता सबसे अधिक महत्व रखती है।
🕉 शिव को भाव प्रिय है, दिखावा नहीं
शिव भोलानाथ हैं। वे यह नहीं देखते कि पूजा कितनी बड़ी है, बल्कि यह देखते हैं कि मन कितना शुद्ध और स्थिर है। यदि हाथ से पूजा हो रही हो लेकिन मन कहीं और भटक रहा हो, तो पूजा का पूर्ण फल नहीं मिलता।
🌿 भटका हुआ मन = अधूरी पूजा
शास्त्रों के अनुसार, जब पूजा के समय मन सांसारिक चिंताओं, क्रोध, भय या इच्छाओं में उलझा रहता है, तो साधक की ऊर्जा बिखर जाती है। इससे मंत्र-जप, अभिषेक और अर्पण का प्रभाव कम हो जाता है।
🔱 एकाग्रता से शिव-तत्त्व का अनुभव
जब मन शांत और एकाग्र होता है, तभी शिव-तत्त्व का अनुभव होता है। ध्यानपूर्वक किया गया “ॐ नमः शिवाय” का एक जप भी हजारों जपों के बराबर फल देता है।
🌙 महाशिवरात्रि में विशेष महत्व
महाशिवरात्रि की रात्रि जागरण, ध्यान और मौन की होती है। इस दिन मन को इधर-उधर भटकने देना साधना में बाधा माना गया है। स्थिर मन से की गई पूजा आत्मशुद्धि और कर्मक्षय में सहायक होती है।
🪔 मन को स्थिर रखने के सरल उपाय
- पूजा से पहले कुछ क्षण गहरी श्वास लें
- मोबाइल और शोर-शराबे से दूरी रखें
- धीमे स्वर में मंत्र जप करें
- शिवलिंग पर दृष्टि टिकाकर पूजा करें
- पूजा को कर्तव्य नहीं, संवाद समझें
✨ निष्कर्ष
शिवपूजन में सबसे बड़ी भेंट एकाग्र मन है। जब मन स्थिर होता है, तभी शिव कृपा प्रकट होती है। इसलिए शिवपूजन के समय मन को इधर-उधर न भटकाकर, पूरे भाव और समर्पण से शिव का स्मरण करें—यही सच्ची पूजा है।
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