जीवित्पुत्रिका व्रत पारण कब करें?
जीवित्पुत्रिका (जितिया / जिवित्पुत्रिका) व्रत का पारण 15 सितंबर 2025 को सुबह के समय शुभ मुहूर्त में किया जाएगा।
नीचे पूरा विवरण है कि कब व कैसे पारण करना है —
✅ इस व्रत का समय सार
| घटना | तिथि / समय |
|---|---|
| नहाय-खाय (पहला दिन) | 13 सितंबर 2025 |
| व्रत का दानिर्जल दिन (अष्टमी तिथि) | 14 सितंबर 2025 |
| पारण (व्रत तोड़ने का शुभ समय) | 15 सितंबर 2025 सुबह में तुलसी-जल अर्पण और स्नान आदि के बाद |
सार्वजनिक स्रोतों के अनुसार “अष्टमी तिथि समाप्त होने के बाद” पारण किया जाता है।
🕉️ पारण की विधि
पारण करते समय कुछ विशेष बातें ध्यान रखने की परंपरा है:
- सुबह स्नान करें। तुलसी के पौधे के पास जल अर्पित करें।
- पारण के बाद हल्का सा भोजन ग्रहण करें।
✅ लाभ (Labh)
- संतान की दीर्घायु और सुरक्षा – इस व्रत से संतान पर आने वाले संकट टलते हैं और उन्हें दीर्घायु प्राप्त होती है।
- सुख-समृद्धि – घर में सुख-शांति बनी रहती है और परिवार पर आपदाएँ नहीं आतीं।
- पारिवारिक एकता – व्रत करने से परिवार में एकता और सौहार्द बढ़ता है।
- आध्यात्मिक लाभ – स्त्री की मनोबल और आत्मशक्ति प्रबल होती है।
🌼 महत्व (Mahatva)
- जीवित्पुत्रिका व्रत मुख्य रूप से माताएँ अपने बच्चों की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि के लिए करती हैं।
- पौराणिक मान्यता है कि जमदग्नि ऋषि की पत्नी रेनुका और लोरिक-कन्हार की कथा से इसका संबंध है।
- इस व्रत का पालन उत्तर भारत, खासकर बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में अधिक होता है।
- इसे “जीवित्पुत्रिका व्रत” या “जितिया” भी कहा जाता है।
📚 शिक्षा (Shiksha)
- त्याग और धैर्य की सीख – माता संतान के लिए कठिन उपवास रखती है, इससे त्याग और धैर्य का महत्व समझ आता है।
- भक्ति और विश्वास – यह व्रत हमें ईश्वर और परंपराओं में आस्था रखने की शिक्षा देता है।
- संस्कार और परंपरा – यह व्रत नई पीढ़ी को मातृ-शक्ति और परंपरा का महत्व समझाता है।
- संतान-प्रेम का प्रतीक – यह दिखाता है कि माँ का प्रेम निःस्वार्थ और अपार होता है।
🙏 विधि (Vidhi) – पारण की
- सुबह स्नान – ब्रह्म मुहूर्त या सूर्योदय के बाद स्नान करें।
- तुलसी पूजन – तुलसी के पौधे में जल अर्पित करें और दीप जलाएँ।
- पारण समय – अष्टमी तिथि समाप्त होने के बाद नवमी तिथि में व्रत का पारण करें।
- भोजन – सबसे पहले हल्का व्रताहार (फल, दूध या प्रसाद) ग्रहण करें।
- विशेष परंपरा – पारण में नोन-बरुवा (बिना नमक का खाना) या परंपरागत पकवान जैसे कचौड़ी, चिउड़ा-दही, साग, अरवा भात आदि ग्रहण किए जाते हैं।
- कथा श्रवण – व्रत की कथा सुनकर ही पारण पूर्ण माना जाता है।
🪔 पूजन सामग्री (Poojan Samagri)
जीवित्पुत्रिका व्रत में पारण व पूजा के लिए सामान्यत: ये सामग्री रखी जाती है –
- कलश – जल से भरा हुआ, आम्रपत्र और नारियल सहित।
- दीपक – घी या तेल का दीपक।
- धूप / अगरबत्ती।
- पान, सुपारी, लौंग, इलायची, कपूर।
- फूल व माला – विशेषकर लाल और पीले फूल।
- रोली, हल्दी, सिंदूर, अक्षत (चावल)।
- मौली (लाल धागा)।
- फलों का थाल – केला, नारियल, मौसमी फल।
- मिठाई या पकवान – पारण के समय कचौड़ी, चिउड़ा-दही, अरवा भात, साग आदि।
- तुलसी पत्ता – पूजन और अर्पण में आवश्यक।
- जल से भरा लोटा व आसन।
- जीवित्पुत्रिका माता की प्रतिमा / चित्र या मिट्टी का स्वरूप।
🙏 पूजा करने के सही उपाय (Sahi Upay)
- शुद्धता – व्रत व पारण से पहले घर और पूजा स्थल को अच्छी तरह स्वच्छ करें।
- संकल्प – कलश स्थापित कर संतान की दीर्घायु और सुख-समृद्धि के लिए संकल्प लें।
- व्रत कथा – जीवित्पुत्रिका व्रत कथा का श्रवण अवश्य करें। बिना कथा सुने व्रत अधूरा माना जाता है।
- तुलसी पूजन – पारण के समय तुलसी को जल अर्पित करना विशेष आवश्यक है।
- नमक रहित भोजन – पारंपरिक रूप से महिलाएँ नमक रहित भोजन ग्रहण करके पारण करती हैं।
- दान-पुण्य – पारण के बाद ब्राह्मण या जरूरतमंद को भोजन व वस्त्र दान करना शुभ माना जाता है।
- मन की शुद्धता – पूरे व्रतकाल में किसी से कटु वचन न बोलें, नकारात्मक विचार न रखें।
- संतान का आशीर्वाद – माता अपने बच्चों को माथे पर हाथ रखकर आशीर्वाद देती है, इसे मंगलकारी माना गया है।
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