जानिए होलिका दहन कब करें – सही तिथि और समय
जानिए होलिका दहन कब करें – सही तिथि, समय और विस्तृत जानकारी
होलिका दहन हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठान है, जो बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक माना जाता है। यह पर्व फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि की रात्रि में मनाया जाता है और इसके अगले दिन रंगों का त्योहार मनाया जाता है। सही तिथि और मुहूर्त का ध्यान रखना अत्यंत आवश्यक माना गया है।
होलिका दहन की सही तिथि
हिंदू पंचांग के अनुसार होलिका दहन फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि को किया जाता है।
लेकिन केवल पूर्णिमा होना पर्याप्त नहीं है — निम्न नियमों का पालन जरूरी है:
1. पूर्णिमा तिथि रात्रि में होनी चाहिए
यदि पूर्णिमा दो दिनों तक रहती है, तो उस दिन होलिका दहन किया जाता है जिस दिन रात्रि में पूर्णिमा तिथि विद्यमान हो।
2. भद्रा काल का विशेष ध्यान
भद्रा काल में होलिका दहन करना शास्त्रों में वर्जित माना गया है।
इसलिए:
- यदि पूर्णिमा दिन में है लेकिन रात्रि में भद्रा है, तो भद्रा समाप्त होने के बाद दहन किया जाता है।
- यदि पूरी रात भद्रा हो, तो भद्रा मुख और पुच्छ का विचार कर निर्णय लिया जाता है।
होलिका दहन का सही समय (मुहूर्त कैसे तय करें?)
होलिका दहन का मुहूर्त तय करते समय निम्न बातों पर ध्यान दिया जाता है:
1. सूर्यास्त के बाद
दहन हमेशा सूर्यास्त के बाद किया जाता है।
2. प्रदोष काल
सूर्यास्त के बाद का लगभग 2 घंटे 24 मिनट का समय प्रदोष काल कहलाता है, जो शुभ माना जाता है।
3. निशीथ काल
यदि प्रदोष में भद्रा हो तो निशीथ (मध्य रात्रि के आसपास) में भी दहन किया जा सकता है।
x4. भद्रा समाप्ति
भद्रा समाप्त होने के बाद ही अग्नि प्रज्वलित करनी चाहिए।
भद्रा काल क्या है?
भद्रा को ज्योतिष में अशुभ माना जाता है। यह पंचांग के करण का एक भाग है।
मान्यता है कि भद्रा काल में शुभ कार्य करने से विघ्न आ सकते हैं।
विशेष रूप से होलिका दहन में भद्रा का त्याग इसलिए किया जाता है क्योंकि पौराणिक कथा के अनुसार भद्रा काल में दहन करने से अनिष्ट फल मिल सकता है।
पौराणिक कथा
होलिका दहन की कथा भक्त प्रह्लाद से जुड़ी है, जो भगवान के परम भक्त थे। उनके पिता हिरण्यकश्यप स्वयं को भगवान मानते थे और चाहते थे कि सब उनकी पूजा करें।
जब प्रह्लाद ने भगवान की भक्ति नहीं छोड़ी, तो हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका को आदेश दिया कि वह प्रह्लाद को आग में लेकर बैठे। होलिका को वरदान था कि अग्नि उसे जला नहीं सकती।
लेकिन भगवान विष्णु की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित बच गए और होलिका जलकर भस्म हो गई।
यह घटना बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक मानी जाती है।
होलिका दहन की विधि (संक्षेप में)
- शुभ मुहूर्त में स्थान को साफ करें।
- लकड़ी, उपले और सूखी टहनियों का ढेर तैयार करें।
- रोली, अक्षत, जल, नारियल, गुड़, नई फसल आदि अर्पित करें।
- परिवार सहित पूजा करें।
- भद्रा समाप्त होने के बाद अग्नि प्रज्वलित करें।
- परिक्रमा करें और सुख-समृद्धि की कामना करें।
महत्वपूर्ण सावधानियां
- भद्रा काल में दहन न करें।
- अत्यधिक देर रात तक प्रतीक्षा न करें यदि शुभ मुहूर्त उपलब्ध हो।
- सार्वजनिक स्थान पर सुरक्षा का ध्यान रखें।
- पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए कम प्रदूषण वाला दहन करें।
संक्षेप में
| नियम | ध्यान रखने योग्य बात |
|---|---|
| तिथि | फाल्गुन पूर्णिमा |
| समय | सूर्यास्त के बाद |
| भद्रा | भद्रा समाप्ति के बाद |
| प्राथमिकता | प्रदोष काल |
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